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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

16 अप्रैल, 2012

कवि निराकार में भी आकार ...



कवि हमेशा लिखता है
चेतन अचेतन
धरती आकाश
शून्य आधार
निराकार में भी आकार ...
पर आपने पहली बार जो पढ़ा
वह पहली रचना
और आखिर में जो पढ़ा
वह रचना आखिरी के दायरे में होती है
पर -
कवि प्रारंभ और अंत से मुक्त होता है !
वह प्रकृति के कण कण में प्रस्फुटित साज है
बंजर में भी आगत
रेगिस्तान में आभास
अकाल में पानी की एक बूंद
मृत्यु में जीवन ... !
कवि को लगता ज़रूर है
कि शब्द खो गए हैं
पर खोने के एहसास में उसके प्राप्य की पोटली होती है !
सपनों में लिखी रचनाएँ
खुली आँखों में अदृश्य हो जाती हैं
पर वह लिखी होती हैं
शब्द भावों की अग्नि में तपे कवि के चेहरे पर
उनको पढ़ने के लिए पारदर्शी आँखें होती हैं
जिनकी पुतलियों में अग्नि सा तेज होता है !
कवि .... शब्द बीज गिराता जाता है
इस बात से अनजान
कि कहाँ गुलमर्ग बना
कहाँ चनाब
कहाँ कैलाश !
उसकी यात्रा कहो या जीवन दर्शन
वह होता है निरंतर चलायमान
सुबह शाम दिन रात की तरह
कभी शाखों पर
कभी शाखों से उतरता
कभी घोंसलों में
कभी परिंदे के परों में ..... कवि निरंतर होता है
अथक अविचल अविरल ...

45 टिप्पणियाँ:

सदा ने कहा…

.... कवि निरंतर होता है
बेहद सार्थक चित्रण कवि का ... आभार

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

कवि कहाँ -कहाँ ,कब-कब,कैसे-कैसे मौजूद रहता है...सब पता चल गया

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अरूण साथी ने कहा…

जीवन दर्शन

Madhuresh ने कहा…

अपनी भावनाओं को शब्दों में बुनकर एक तृप्ति चाहता है कवि...
और इसी तृप्ति की गंगा में सिंचित होती हैं कई कल्पनाएँ... अविराम..अगणित...

इतनी सुन्दरता से कवि को परिभाषित किया है आपने!
सादर

Suman ने कहा…

कवि .... शब्द बीज गिराता जाता है
इस बात से अनजान
कि कहाँ गुलमर्ग बना
कहाँ चनाब
कहाँ कैलाश !

बिलकुल सही कहा है ......
कवि के शब्द बीज किस भूमि में अंकुरित होंगे उस भूमि पर सब निर्भर है !
बहुत सुंदर रचना प्रारम्भ से अंत तक !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कवी और उसकी कविता दोनों ही निरंतर होते हैं ... बहता हुवा पानी ही अच्छा रहता है ... ...

अनुपमा पाठक ने कहा…

कवि को लगता ज़रूर है
कि शब्द खो गए हैं
पर खोने के एहसास में उसके प्राप्य की पोटली होती है !
So profound!!!

expression ने कहा…

कवि को लगता ज़रूर है
कि शब्द खो गए हैं
पर खोने के एहसास में उसके प्राप्य की पोटली होती है !
सपनों में लिखी रचनाएँ
खुली आँखों में अदृश्य हो जाती हैं
पर वह लिखी होती हैं
शब्द भावों की अग्नि में तपे कवि के चेहरे पर
उनको पढ़ने के लिए पारदर्शी आँखें होती हैं
जिनकी पुतलियों में अग्नि सा तेज होता है !

बहुत सुंदर दी..............
बेमिसाल...........................................

Amrita Tanmay ने कहा…

शब्द बीज से ही फूटता है काव्य....बहुत सुंदर..

ऋता शेखर मधु ने कहा…

कभी शाखों पर
कभी शाखों से उतरता
कभी घोंसलों में
कभी परिंदे के परों में ..... कवि निरंतर होता है
अथक अविचल अविरल ...

हर कोने में पहुँच जाता है कवि का मन...

ASHA BISHT ने कहा…

kvi mann ka shi varnan...aur bahut hi santulit shabd chayan..

shikha varshney ने कहा…

वाह ..बहुत सुन्दर.

Anita ने कहा…

कवि .... शब्द बीज गिराता जाता है
इस बात से अनजान
कि कहाँ गुलमर्ग बना
कहाँ चनाब
कहाँ कैलाश !
उसकी यात्रा कहो या जीवन दर्शन
वह होता है निरंतर चलायमान

कवि को परिभाषित करती एक कालजयी रचना...सचमुच कवि तो यायावर है...उसने कुछ पाया है जिसे लुटाते हुए वह थकता ही नहीं, बहुत सुंदर रश्मि जी.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

कवि प्रारंभ और अंत से मुक्त होता है !
कवि निरंतर होता है
अथक अविचल अविरल ...

महती सत्य को रेखांकित करती प्रभावी रचना दी...
सादर बधाई.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति वाह!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति वाह!

Arvind Jangid ने कहा…

कवि को लगता ज़रूर है
कि शब्द खो गए हैं..बहुत ही सुन्दर आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आदि से अनन्त तक, कवि की कल्पना।

Santosh Kumar Jha ने कहा…

बहुत सुन्दर भावार्थ इन पक्तियों में छिपा हुआ है!
बहुत प्यारी रचना.

Santosh Kumar Jha ने कहा…

बहुत सुन्दर भावार्थ इन पक्तियों में छिपा हुआ है!
बहुत प्यारी रचना.

M VERMA ने कहा…

कवि को लगता ज़रूर है
कि शब्द खो गए हैं
पर खोने के एहसास में उसके प्राप्य की पोटली होती है !
इस खोने और पाने के बीच ही तो कहीं कवि है

RITU ने कहा…

कवि के भाव ही उसकी कलम की स्याही होते हैं ..
kalamdaan

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

भावो की नदी सी यह कविता...

pran sharma ने कहा…

AAPKEE LEKHNI SE NIKLEE EK AUR
HRIDAY KO CHHOOTEE KAVITA . SHABDON
AUR BHAVON MEIN SANGEET RACHAA -
BASAA HAI .

डॉ टी एस दराल ने कहा…

शुद्ध कवि आजकल कम ही मिलते हैं । लेकिन जो होते हैं , बहुत निर्मल हृदय होते हैं ।
सुन्दर रचना ।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

शब्‍दों के बीच छिपे अर्थ कवि मन ही खोजता है।

मनोज कुमार ने कहा…

कवि के अंतस से निकली कवि की बात सही है।

Atul Shrivastava ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है।
चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं....
आपकी एक टिप्‍पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सचमुच एक कवि की इतनी सुन्दर भावाभिव्यक्ति एक कवि ही कर सकता है दीदी!! कविता के सृजन में समर्पित कवियों की प्रतिनिधि कविता!!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सच है..... गतिशील बने रहते है कवि भाव

Sadhana Vaid ने कहा…

कवि .... शब्द बीज गिराता जाता है
इस बात से अनजान
कि कहाँ गुलमर्ग बना
कहाँ चनाब
कहाँ कैलाश !
उसकी यात्रा कहो या जीवन दर्शन
वह होता है निरंतर चलायमान
कितना बड़ा सच है इन पंक्तियों में ! ये शब्द बीज ही जब प्रस्फुटित होते हैं तो इतने शक्तिमान हो जाते हैं कि पल भर में समाज और व्यवस्था की नींवें दरकने लगती हैं ! बहुत सार्थक एवं प्रभावी रचना ! ढेर सारी बधाई रश्मि जी !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कवि को लगता ज़रूर है
कि शब्द खो गए हैं
पर खोने के एहसास में उसके प्राप्य की पोटली होती है !

मेरी तो पोटली ही खो गयी है ॥ढूंढ रही हूँ .... न जाने कहाँ रख कर भूल गयी हूँ :):)

बहुत सुंदर प्रस्तुति

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

कवि पर लिखी आपकी कविता ....
चरितार्थ करता जहाँ न पहुंचें रवि ,वहाँ पहुंचें कवि ....
अथक अविचल अविरल ... बहुत खुबा .....

वाणी गीत ने कहा…

सोच लेते हैं कि शब्द खो गये हैं , मगर खोते नहीं है , गूंजते हैं दिमाग में कहीं फिर कही किसी बहाने से कागज पर उतरते हैं !!
एक श्रृंखला है विचारों की , जो शब्द बीज बनकर काव्य के रूप में उतरती है !!
बहुत बढ़िया !

Saras ने कहा…

.....तभी तो हो पाता है सृजन .....खिल पाते हैं फूल ...उद्गम होता है नई नदियों का ......उठ खड़े होती हैं फसलें ......सृष्टि को मिल जाता है एक नया रूप ..जो कवि की अपनी कल्पना से उपजा है .........बहुत सुन्दर रचना रश्मिजी .....

Saras ने कहा…

तभी तो हो पाता है सृजन .....खिल पाते हैं फूल ...उद्गम होता है नई नदियों का ......उठ खड़े होती हैं फसलें ......सृष्टि को मिल जाता है एक नया रूप ..जो कवि की अपनी कल्पना से उपजा है .........बहुत सुन्दर रचना रश्मिजी .....

रजनीश तिवारी ने कहा…

कवि प्रारंभ और अंत से मुक्त होता है !
मन का कोई दायरा नहीं। बहुत सुंदर रचना ....शुभकामनाएँ ।

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" ने कहा…

कवि निरंतर होता है
अथक अविचल अविरल ...

फिर कहना ही क्या ?
अपनी अपनी दृष्टि से
सब देखते रहेंगे
विचार आते रहेंगे
सब के विचार
भिन्न भिन्न होंगे
पर कौन निश्चित करेगा
किसने सही समझा
किसने नहीं समझा ....
यूँ ही चलते रहेंगे
एक दिन विचारों जैसे
निराकार हो जायेंगे

Anupama Tripathi ने कहा…

कवि कल्पना अपनी ही दुनिया बनाती है ....
चाहे जब ...चाहे जहाँ ....
बहुत सही ...और सुंदर भाव दी ....

dheerendra ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर अभिव्यक्ति,

MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...

minoo bhagia ने कहा…

kavi nirantar hota hai , sunder shabdon ka prayog kiya hai rashmi

संध्या शर्मा ने कहा…

बिलकुल सही कहा है आपने ...
कवि निरंतर होता है
अथक अविचल अविरल ...
कल्पना का कोई अंत नहीं होता, कवि मन हर क्षण सृजन में लगा होता है... सुन्दर अमर रचना के लिए आभार आपका

Kailash Sharma ने कहा…

सपनों में लिखी रचनाएँ
खुली आँखों में अदृश्य हो जाती हैं
पर वह लिखी होती हैं
शब्द भावों की अग्नि में तपे कवि के चेहरे पर
उनको पढ़ने के लिए पारदर्शी आँखें होती हैं
जिनकी पुतलियों में अग्नि सा तेज होता है !

....बहुत सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति...आभार

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

कवि मृत्यु में जीवन है ... कवि निरंतर होता है
अथक अविचल अविरल ... कवि का बहुत सटीक वर्णन, बधाई.